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यक्ष कुबेर जी की आरती
🪔 आरती · कुबेर जी

यक्ष कुबेर जी की आरती: भावार्थ और आरती की विधि

यक्ष कुबेर जी की आरती भगवान कुबेर की महिमा, शिवभक्ति और शरणागत भक्तों के प्रति उनके स्नेह का गुणगान करती है। इसमें राजसी वैभव के साथ बल, बुद्धि और विद्या की प्रार्थना भी है। दीपावली के पूजन या घर की नियमित उपासना में इसका गायन करते हुए आप समृद्धि के साथ कृतज्ञता, विवेक और सदुपयोग का भाव रख सकते हैं।

पाठ स्रोत: Aarti Sangrah
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यक्ष कुबेर जी की आरती

ॐ जय यक्ष कुबेर हरे, स्वामी जै यक्ष जै यक्ष कुबेर हरे । शरण पड़े भगतों के, भण्डार कुबेर भरे । ॐ जय यक्ष कुबेर हरे...

शिव भक्तों में भक्त कुबेर बड़े, स्वामी भक्त कुबेर बड़े । दैत्य दानव मानव से, कई-कई युद्ध लड़े ॥ ॐ जय यक्ष कुबेर हरे...

स्वर्ण सिंहासन बैठे, सिर पर छत्र फिरे, स्वामी सिर पर छत्र फिरे । योगिनी मंगल गावैं, सब जय जय कार करैं ॥ ॐ जय यक्ष कुबेर हरे...

गदा त्रिशूल हाथ में, शस्त्र बहुत धरे, स्वामी शस्त्र बहुत धरे । दुख भय संकट मोचन, धनुष टंकार करें ॥ ॐ जय यक्ष कुबेर हरे...

भांति भांति के व्यंजन बहुत बने, स्वामी व्यंजन बहुत बने । मोहन भोग लगावैं, साथ में उड़द चने ॥ ॐ जय यक्ष कुबेर हरे...

बल बुद्धि विद्या दाता, हम तेरी शरण पड़े, स्वामी हम तेरी शरण पड़े । अपने भक्त जनों के, सारे काम संवारे ॥ ॐ जय यक्ष कुबेर हरे...

मुकुट मणी की शोभा, मोतियन हार गले, स्वामी मोतियन हार गले । अगर कपूर की बाती, घी की जोत जले ॥ ॐ जय यक्ष कुबेर हरे...

यक्ष कुबेर जी की आरती, जो कोई नर गावे, स्वामी जो कोई नर गावे । कहत प्रेमपाल स्वामी, मनवांछित फल पावे ॥ ॐ जय यक्ष कुबेर हरे...

॥ इति ॥

मूल पाठ: Aarti Sangrah

यक्ष कुबेर जी की आरती — भावार्थ

आरती के आरंभ में यक्ष कुबेर की जय करते हुए उनकी शरण में आए भक्तों के लिए भरपूर आश्रय और पोषण की भावना व्यक्त की गई है। आगे उन्हें शिव का बड़ा भक्त बताया गया है। दैत्य, दानव और मानव के साथ युद्धों का उल्लेख उनके पराक्रम को सामने लाता है। स्वर्ण सिंहासन और सिर पर छत्र उनके राजसी गौरव के प्रतीक हैं; योगिनियों के मंगलगान और जयकार से उत्सव का वातावरण बनता है। गदा, त्रिशूल और धनुष जैसे शस्त्र उनके रक्षक स्वरूप तथा दुख, भय और संकट से उबारने की प्रार्थना को व्यक्त करते हैं।

इसके बाद विविध व्यंजनों, मोहन भोग और उड़द-चने के अर्पण से भक्त का स्नेह प्रकट होता है। कुबेर को बल, बुद्धि और विद्या का दाता मानकर जीवन के कार्य सँवारने की विनती की जाती है। मणियों से सजा मुकुट और मोतियों का हार उनके वैभव को उभारते हैं, जबकि अगर, कपूर की बाती और घी की ज्योति पूजन का सुगंधित, प्रकाशमय दृश्य रचते हैं। अंत में प्रेमपाल नाम के साथ आरती गाने की महिमा कही गई है। श्रद्धालु इस समापन को भक्तिभाव से की गई प्रार्थना और शुभ अभिलाषाओं की पूर्ति की आशा के रूप में ग्रहण करते हैं।

कुबेर जी की आरती कब करें?

कुबेर जी की आरती घर की नियमित पूजा में या विशेष पर्व के पूजन के अंत में की जा सकती है। दीपावली पंचपर्व में धनतेरस और दीपावली के लक्ष्मी पूजन के साथ कुबेर उपासना का विशेष संबंध माना जाता है। कुछ परिवारों और क्षेत्रीय परंपराओं में कार्तिक पूर्णिमा अथवा देव दीपावली तथा कोजागरी या शरद पूर्णिमा पर भी उनका स्मरण किया जाता है। पर्व पर पूजा का क्रम अपने परिवार की परंपरा के अनुसार रखें। इस वर्ष की तिथि और मुहूर्त के लिए DivyaKaal का संबंधित पर्व पृष्ठ देखें।

थाली, दीपक और आरती घुमाने का क्रम

एक स्थिर आरती-थाली में सुरक्षित दीपक रखें। घी की ज्योति इस आरती की भावभूमि से जुड़ी है; कपूर का प्रयोग घर की परंपरा के अनुसार किया जा सकता है। पूजन और भोग के बाद प्रतिमा या चित्र के सामने थाली को घड़ी की दिशा में धीरे-धीरे घुमाएँ। अनेक पूजा-पद्धतियों में चार बार चरणों के सामने, दो बार नाभि के सामने, एक बार मुख के सामने और सात बार संपूर्ण स्वरूप के सामने आरती घुमाने का क्रम बताया जाता है। अपने संप्रदाय का प्रचलित क्रम अपनाएँ। घंटी को गायन के अनुकूल मधुर स्वर में बजाएँ और लौ को कपड़ों व सजावट से दूर रखें।

कुबेर जी की महिमा और आरती का भाव

हिंदू परंपरा में कुबेर यक्षों के अधिपति, धन के संरक्षक और उत्तर दिशा के दिक्पाल माने जाते हैं। इस आरती की विशेषता यह है कि उनके वैभव के साथ उनकी शिवभक्ति और रक्षक स्वरूप भी सामने आते हैं। श्रद्धालु बल, बुद्धि और विद्या की प्रार्थना को जीवन में विवेक तथा उत्तरदायित्व विकसित करने की प्रेरणा मानते हैं। इस भाव से उपासना करते समय उपलब्ध साधनों के प्रति आभार, परिवार के प्रति कर्तव्य और दान की भावना को स्थान दें। समृद्धि का स्मरण तब सहेजने और साझा करने की भावना से जुड़ता है।

आरती के बाद ज्योति और प्रसाद ग्रहण करें

गायन पूरा होने पर दीपक को सुरक्षित स्थान पर रखें। आरती लेते समय दोनों हथेलियों को लौ से उचित दूरी पर रखकर उसकी ऊष्मा अपनी ओर करें और श्रद्धापूर्वक मस्तक से लगाएँ। परंपरा में यह देवकृपा के प्रति आदर का संकेत है। इसके बाद प्रणाम करें और अर्पित भोग को प्रसाद के रूप में बाँटें। आरती में उल्लिखित व्यंजनों का स्मरण करते हुए आप अपनी सामर्थ्य और पारिवारिक रीति के अनुसार भोग रख सकते हैं। कुछ क्षण शांत बैठकर कृतज्ञता व्यक्त करना भी उपासना का सुंदर समापन है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या कुबेर जी की आरती रोज कर सकते हैं?

हाँ, आप अपनी नियमित पूजा में कुबेर जी की आरती शामिल कर सकते हैं। स्वच्छ पूजास्थान पर दीपक जलाकर शांत मन से गायन करें। प्रतिदिन की उपासना में समय की लंबाई से अधिक श्रद्धा, एकाग्रता और सहज नियमितता को महत्व दिया जाता है।

दीपावली पर लक्ष्मी पूजा के साथ कुबेर जी की आरती कब करें?

अनेक परिवारों में लक्ष्मी और कुबेर पूजन, पुष्प अर्पण तथा भोग के बाद आरती की जाती है। आरतियों का क्रम अपनी पारिवारिक या संप्रदाय की पद्धति के अनुसार रखें। इस वर्ष की तिथि और मुहूर्त के लिए DivyaKaal का दीपावली पर्व पृष्ठ देखें।

कुबेर जी की आरती में कौन-सा भोग लगाया जाता है?

आरती में विविध व्यंजनों, मोहन भोग और उड़द-चने का उल्लेख है। घर में भोग का चयन पारिवारिक परंपरा, उपलब्ध सामग्री और सामर्थ्य के अनुसार करें। स्वच्छता से तैयार किया गया अर्पण श्रद्धापूर्वक रखें और पूजा के बाद उसे प्रसाद के रूप में बाँटें।

कुबेर जी की आरती का मुख्य भाव क्या है?

इस आरती का मुख्य भाव कुबेर जी की शरण लेकर उनकी शिवभक्ति, महिमा और रक्षक स्वरूप का स्मरण करना है। इसमें बल, बुद्धि और विद्या की प्रार्थना भी है। श्रद्धालु इसे समृद्धि के प्रति कृतज्ञता और साधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की प्रेरणा से जोड़ते हैं।

कुबेर जी का स्मरण करें और अपने जीवन में कृतज्ञता, विवेक तथा उदारता को स्थान दें।