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श्री गणेश चालीसा
📿 चालीसा · श्री गणेशजी

श्री गणेश चालीसा — पाठ और भावार्थ

श्री गणेश चालीसा विघ्नहर्ता गणपति के मंगलमय स्वरूप, बुद्धि और करुणा की स्तुति है। इसमें उनके जन्म, गजवदन स्वरूप और प्रथम पूज्य होने की कथा के साथ भक्त की विनम्र प्रार्थना आती है।

पाठ स्रोत: चालीसा संग्रह
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श्री गणेश चालीसा

॥ दोहा ॥ जय गणपति सद्गुण सदन, करिवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

॥ चौपाई ॥ जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥

जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्वविनायक बुद्धि विधाता॥

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥

सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥

धनि शिव सुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व विख्याता॥

ऋद्धि सिद्धि तव चँवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥

कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी॥

एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हों भारी॥

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुँच्यो तुम धरि द्विज रूपा॥

अतिथि जानि के गौरी सुखारी। बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥

अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

मिलहिं पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥

गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥

अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै। पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥

बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना॥

सकल मगन सुख मंगल गावहिं। नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥

शम्भु उमा बहु दान लुटावहिं। सुर मुनिजन सुत देखन आवहिं॥

लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आए शनि राजा॥

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक देखन चाहत नाहीं॥

गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥

कहन लगे शनि मन सकुचाई। का करिहौं शिशु मोहि दिखाई॥

नहिं विश्वास उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कह्यऊ॥

पड़तहिं शनि दृगकोण प्रकाशा। बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥

गिरिजा गिरी विकल ह्वै धरणी। सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥

हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्हों लखि सुत का नाशा॥

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये। काटि चक्र सो गजशिर लाये॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हें। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हें॥

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥

चले षडानन भरमि भुलाई। रचे बैठि तुम बुद्धि उपाई॥

चरण मातु पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥

धनि गणेश कहि शिव हिय हरष्यो। नभ ते सुरन सुमन बहु वर्ष्यो॥

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहस मुख सके न गाई॥

मैं मति हीन मलीन दुखारी। करहूँ कौन विधि विनय तुम्हारी॥

भजत राम सुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग ककरा दुर्वासा॥

अब प्रभु दया दीन पर कीजे। अपनी भक्ति शक्ति कुछ दीजे॥

॥ दोहा ॥ श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करे धर ध्यान। नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सम्मान॥

सम्बन्ध अपना सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश। पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥

॥ इति ॥

मूल पाठ: चालीसा संग्रह

श्री गणेश चालीसा — भावार्थ

आरंभिक दोहे में गणपति से विघ्न दूर करने और मंगल प्रदान करने की प्रार्थना है। चौपाइयों में उनके गजमुख, सुंदर सूँड़, मुकुट, पीताम्बर, मोदक तथा मूषक-वाहन का स्मरण है। शिव-पार्वती के प्रिय पुत्र और कार्तिकेय के भ्राता के रूप में उनका गुणगान किया गया है।

आगे इस चालीसा में प्रचलित जन्मकथा आती है—पार्वतीजी की तपस्या, अतिथि-सेवा, बालक का प्राकट्य और शनि की दृष्टि से उत्पन्न संकट। विष्णुजी द्वारा गजशिर लाने तथा शिवजी द्वारा प्राण प्रतिष्ठित करने के प्रसंग में गणेशजी के गजानन और प्रथम पूज्य स्वरूप का वर्णन है। माता-पिता की परिक्रमा वाली कथा उनकी विवेकपूर्ण बुद्धि और मातृ-पितृभक्ति को उजागर करती है।

अंत में भक्त अपनी अल्पबुद्धि स्वीकार करके प्रभु से दया, शक्ति और भक्ति माँगता है। समापन के दोहे ध्यानपूर्वक पाठ की महिमा बताते हैं। समूची चालीसा में मंगल, विवेक, विनम्रता और माता-पिता के प्रति आदर का भाव है।

पाठ का भक्तिभाव

गणेशजी से सद्बुद्धि और शुभ कार्यों में स्थिरता की प्रार्थना करें। माता-पिता के प्रति आदर और विनम्रता को जीवन में स्थान दें।

पाठ की सरल विधि

स्वच्छ पूजा-स्थान में श्री गणेशजी के चित्र या विग्रह के सामने शांत भाव से बैठें। दीप, पुष्प और यथाशक्ति नैवेद्य अर्पित करें। आरंभिक वंदना सहित पूरा पाठ स्पष्ट उच्चारण से पढ़ें और प्रत्येक पद का भाव स्मरण करें। अंत में प्रणाम, आरती और प्रसाद-वितरण करें।

पाठ कब करें

गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी, विनायक चतुर्थी और शुभ कार्य के आरंभ में गणेश-स्मरण के साथ पाठ करें। नियमित पाठ के लिए सुविधानुसार प्रातः या संध्या का शांत समय चुनें। श्रद्धा, अर्थ का चिंतन और सदाचरण को उपासना का अंग बनाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री गणेश चालीसा किसकी स्तुति है?

श्री गणेश चालीसा विघ्नहर्ता गणपति के मंगलमय स्वरूप, बुद्धि और करुणा की स्तुति है। इसमें उनके जन्म, गजवदन स्वरूप और प्रथम पूज्य होने की कथा के साथ भक्त की विनम्र प्रार्थना आती है।

क्या इस चालीसा का नित्य पाठ कर सकते हैं?

हाँ, इसे नित्य पूजा में पढ़ सकते हैं। शांत मन से स्पष्ट उच्चारण करें और पाठ के भाव को समझने का प्रयास करें।

पाठ किस समय करें?

गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी, विनायक चतुर्थी और शुभ कार्य के आरंभ में गणेश-स्मरण के साथ पाठ करें। प्रातः या संध्या का सुविधाजनक समय चुनें।

पाठ के बाद क्या करें?

प्रणाम करके आरती करें और अर्पित प्रसाद बाँटें। गणेशजी से सद्बुद्धि और शुभ कार्यों में स्थिरता की प्रार्थना करें। माता-पिता के प्रति आदर और विनम्रता को जीवन में स्थान दें।

श्री गणेशजी की कृपा का स्मरण करें। गणपति बाप्पा मोरया!