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श्री कनकधारा स्तोत्रम् — २२ श्लोक
🕉️ स्तोत्र एवं स्तुति · श्री महालक्ष्मी

श्री कनकधारा स्तोत्रम् — २२ श्लोक और भावार्थ

श्री कनकधारा स्तोत्रम् भगवती महालक्ष्मी की करुणा और मंगलमयी कृपादृष्टि की सुंदर संस्कृत स्तुति है। परंपरा में इसे आदि शंकराचार्यजी की रचना माना जाता है। इसमें भक्त माँ लक्ष्मी से अभाव, दुःख और दैन्य दूर करने तथा जीवन में कल्याण, सद्गुण और समृद्धि प्रदान करने की प्रार्थना करता है। यहाँ प्रचलित २२-श्लोकी पाठ दिया गया है।

पाठ स्रोत: श्री कनकधारा स्तोत्रम् — शाङ्कर स्तोत्र-संग्रह परंपरा (प्रचलित २२-श्लोकी पाठ)
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श्री कनकधारा स्तोत्रम् — २२ श्लोक

अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् । अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥ १ ॥

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि । माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥ २ ॥

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्- आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् । आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥ ३ ॥

बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति । कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥ ४ ॥

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेः धाराधरे स्फुरति या तटिदङ्गनेव । मातुस्समस्तजगतां महनीयमूर्तिः भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥ ५ ॥

प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावात् माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन । मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥ ६ ॥

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षं आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि । ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्थं इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥ ७ ॥

इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते । दृष्टिः प्रहृष्ट कमलोदरदीप्तिरिष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥ ८ ॥

दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा- मस्मिन्न किञ्चन विहङ्गशिशौ विषण्णे । दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥ ९ ॥

गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति । सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥ १० ॥

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै । शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥ ११ ॥

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै । नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥ १२ ॥

नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायै नमोऽस्तु भूमण्डलनायिकायै । नमोऽस्तु देवादिदयापरायै नमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै ॥ १३ ॥

नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै नमोऽस्तु विष्णोरुरसिस्थितायै । नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै ॥ १४ ॥

नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै । नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै नमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै ॥ १५ ॥

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि । त्वद्वन्दनानि दुरितोद्धरणोद्यतानि मामेव मातरनिशं कलयन्तु नान्ये ॥ १६ ॥

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः सेवकस्य सकलार्थसम्पदः । सन्तनोति वचनाङ्गमानसैः त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥ १७ ॥

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे । भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥ १८ ॥

दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट स्वर्वाहिनी विमलचारुजलप्लुताङ्गीम् । प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥ १९ ॥

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः । अवलोकय मामकिञ्चनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥ २० ॥

देवि प्रसीद जगदीश्वरि लोकमातः कल्याणदात्रि कमलेक्षणजीवनाथे । दारिद्र्यभीतिहृदयं शरणागतं माम् आलोकय प्रतिदिनं सदयैरपाङ्गैः ॥ २१ ॥

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् । गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥ २२ ॥

|| इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृत श्री कनकधारास्तोत्रं संपूर्णम् ॥

॥ इति ॥

मूल पाठ: श्री कनकधारा स्तोत्रम् — शाङ्कर स्तोत्र-संग्रह परंपरा (प्रचलित २२-श्लोकी पाठ)

श्री कनकधारा स्तोत्रम् — २२ श्लोक — भावार्थ

स्तोत्र के आरंभिक श्लोकों में भगवती लक्ष्मी के प्रेमपूर्ण कटाक्ष का वर्णन भँवरों, कमलों, नीलमणियों और मेघ में चमकती बिजली की सुंदर उपमाओं से किया गया है। भगवान विष्णु के वक्षःस्थल को सुशोभित करने वाली देवी की क्षणभर की करुणादृष्टि भी भक्त के लिए मंगल और कल्याण का आश्रय है। कवि स्वयं को अभाव से व्याकुल पक्षी के शिशु के समान रखकर माँ से दया की वर्षा की प्रार्थना करता है। नारायणप्रिया के नेत्रों को मेघ और उनकी करुणा को वर्षा के समान स्मरण किया गया है।

मध्य भाग में देवी को विद्या, शक्ति, पुष्टि और समस्त जगत की जननी के रूप में प्रणाम किया गया है। वे कमलनयनी, क्षीरसागर से प्रकट हुईं, नारायण की प्रिया और भृगुनन्दिनी हैं। स्वर्णकमल के आसन, भगवान विष्णु के वक्षःस्थल और कमलालय के संबोधन उनके सौंदर्य तथा दिव्य महिमा का गुणगान करते हैं। भक्त चाहता है कि देवी की वंदना उसके जीवन का निरंतर अंग बने। वाणी, शरीर और मन से उनकी उपासना करते हुए वह शुभ जीवन और अंतःकरण की शुद्धि की प्रार्थना करता है।

अंतिम भाग में कमलासन पर विराजमान, करकमलों में कमल धारण करने वाली हरिवल्लभा का ध्यान है। स्वर्णकलशों से अभिषेक करते दिग्गज उनकी ऐश्वर्यमयी छवि का स्मरण कराते हैं। भक्त अपने दैन्य को माँ के सामने रखकर उनकी करुणादृष्टि माँगता है। सम्मिलित प्रार्थना-श्लोक में जगज्जननी से प्रतिदिन कृपापूर्वक देखने की विनती है। समापन की फलश्रुति नित्य स्तुति करने वालों के गुण, सौभाग्य और निर्मल भाव की महिमा बताती है। इस प्रकार स्तोत्र में समृद्धि की कामना के साथ विनम्रता, दया और अनन्य शरणागति का भाव समाहित है।

आदि शंकराचार्यजी और कनकधारा की कथा

परंपरागत कथा के अनुसार बाल संन्यासी शंकराचार्यजी भिक्षा के लिए एक निर्धन गृहिणी के द्वार पहुँचे। गृहिणी ने अभाव में भी श्रद्धापूर्वक एक आँवला अर्पित किया। उसके दान और करुणा से द्रवित होकर आचार्य ने महालक्ष्मी की स्तुति की। देवी की कृपा से स्वर्ण-आँवलों की वर्षा होने की कथा कनकधारा नाम से जुड़ी है। यह प्रसंग दान की भावना, करुणा और निःस्वार्थ भक्ति का स्मरण कराता है।

इस २२-श्लोकी पाठ का क्रम

कनकधारा स्तोत्र के संग्रहों में श्लोक-संख्या और क्रम के पाठभेद मिलते हैं। यहाँ प्रचलित विस्तृत क्रम में २२ श्लोक हैं। ‘देवि प्रसीद’ से आरंभ होने वाला प्रार्थना-श्लोक २१वें स्थान पर और ‘स्तुवन्ति ये’ से आरंभ होने वाली फलश्रुति २२वें स्थान पर है। कुछ संग्रहों में प्रार्थना-श्लोक अतिरिक्त रूप से दिया जाता है।

पाठ की सरल विधि

स्वच्छ पूजा-स्थान में माँ लक्ष्मी और भगवान विष्णु का ध्यान करें। दीप जलाकर पुष्प तथा यथाशक्ति नैवेद्य अर्पित करें। संस्कृत पाठ को शांत गति से, स्पष्ट उच्चारण और अर्थ के स्मरण के साथ पढ़ें। पाठ के बाद माँ से सद्बुद्धि, संतोष, सदाचार और कल्याण की प्रार्थना करें। अंत में प्रणाम और आरती करके प्रसाद बाँटें।

पाठ कब करें

इसे नित्य प्रातः या संध्या की लक्ष्मी-पूजा में पढ़ सकते हैं। शुक्रवार, दीपावली के लक्ष्मी-पूजन, कोजागरी पूर्णिमा और अक्षय तृतीया पर भी इसका पाठ किया जाता है। उपासना के साथ दान, अतिथि-सत्कार और जरूरतमंदों के प्रति करुणा को जीवन में स्थान दें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कनकधारा स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

परंपरा में कनकधारा स्तोत्र आदि शंकराचार्यजी की रचना माना जाता है। यह भगवती महालक्ष्मी को समर्पित संस्कृत स्तुति है।

यहाँ कितने श्लोक दिए गए हैं?

यहाँ प्रचलित २२-श्लोकी पाठ है। इसमें २१वाँ श्लोक ‘देवि प्रसीद’ प्रार्थना है और २२वाँ श्लोक ‘स्तुवन्ति ये’ फलश्रुति है। अलग संग्रहों में संख्या तथा क्रम में भेद मिलता है।

कनकधारा नाम का क्या अर्थ है?

कनक का अर्थ सोना और धारा का अर्थ प्रवाह या वर्षा है। नाम परंपरागत स्वर्ण-आँवलों की वर्षा की कथा से जुड़ा है और माँ लक्ष्मी की उदार कृपा का स्मरण कराता है।

क्या इसका नित्य पाठ कर सकते हैं?

हाँ, नित्य लक्ष्मी-पूजा के साथ इसका पाठ कर सकते हैं। शांत मन, स्पष्ट उच्चारण और अर्थ का ध्यान रखते हुए नियमित उपासना करें।

इस स्तोत्र का मुख्य भाव क्या है?

भक्त माँ लक्ष्मी की करुणादृष्टि का आश्रय माँगता है। समृद्धि के साथ दैन्य से मुक्ति, शुभ जीवन, सद्गुण और विनम्र शरणागति इसके प्रमुख भाव हैं।

माँ महालक्ष्मी की करुणा का स्मरण करें और श्रद्धा, संतोष तथा दानशीलता को अपने जीवन में स्थान दें। श्री महालक्ष्म्यै नमः।