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श्री गौ माता जी की आरती
🪔 आरती · श्री गौ माता

श्री गौ माता जी की आरती और सरल भावार्थ

श्री गौ माता जी की आरती गोमाता के पोषण, वात्सल्य और सबके प्रति समान स्नेह का गुणगान करती है। इसके भावों को समझते हुए आप आरती को कृतज्ञता और सेवा के अवसर के रूप में अपना सकते हैं। दैनिक गोसेवा, गोवत्स द्वादशी और गोपाष्टमी के पूजन में यह स्तुति श्रद्धा से गाई जाती है।

पाठ स्रोत: Gita Press, Gorakhpur - Aarti Sanghrah
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श्री गौ माता जी की आरती

आरती श्री गैया मैया की, आरती हरनी विश्व धैया की। आरती श्री गैया मैया की॥

अर्थ-काम सद्धर्म प्रदायिनी, अविचल अमल मुक्ति-पद दायिनी। सुर-मानव सौभाग्य विधायिनी, प्यारी पूज्य नंद छैयाँ की॥ आरती श्री गैया मैया की॥

अखिल विश्व प्रतिपालिनी माता, मधुर अमिय दुग्धान्न प्रदाता। रोग-शोक संकट परित्राता, भवसागर हित दृढ़ नैया की॥ आरती श्री गैया मैया की॥

आयु, ओज, आरोग्य विकासिनी, दुःख, दैन्य, दारिद्र्य विनाशिनी। सुषमा, सौख्य, समृद्धि प्रकाशिनी, विमल विवेक-बुद्धि दैया की॥ आरती श्री गैया मैया की॥

सेवक हो चाहे दुःखदाई, सम पय-सुधा पियावति माई। शत्रु-मित्र सबको सुखदाई, स्नेह-स्वभाव विश्व जैया की॥ आरती श्री गैया मैया की॥

आरती श्री गैया मैया की, आरती हरनी विश्व धैया की। आरती श्री गैया मैया की॥

॥ इति ॥

मूल पाठ: Gita Press, Gorakhpur - Aarti Sanghrah

श्री गौ माता जी की आरती — भावार्थ

आरती के आरंभ में गोमाता को स्नेहमयी माता मानकर उनका वंदन किया गया है। आगे उन्हें जीवन के उचित साधनों, शुभ इच्छाओं और सदाचरण की प्रेरणा देने वाली बताया गया है। निर्मल और अटल मुक्ति का उल्लेख भक्ति के उस लक्ष्य की ओर संकेत करता है, जिसमें मन सांसारिक आसक्तियों से ऊपर उठता है। देवताओं और मनुष्यों के सौभाग्य से जुड़ी उनकी महिमा तथा नंद के आश्रय का स्मरण ब्रज के गोपालन और कृष्णभक्ति के वातावरण को सामने लाता है। फिर गोमाता को संसार का पोषण करने वाली माता कहा गया है। दूध और अन्न का अमृत जैसा वर्णन उनके पोषणकारी स्वरूप के प्रति कृतज्ञता है। संसार को समुद्र और मातृकृपा को दृढ़ नाव मानने की छवि जीवन की कठिनाइयों में आध्यात्मिक सहारे का भाव व्यक्त करती है।

अगले भाग में जीवन-शक्ति, सुख, सौंदर्य और समृद्धि की कामना के साथ निर्मल विवेक का महत्व उभरता है। दुख और अभाव से उबरने की प्रार्थना भक्त के आशापूर्ण मन को दर्शाती है। अंत में गोमाता का निष्पक्ष वात्सल्य केंद्र में आता है: सेवा करने वाले और कष्ट देने वाले, मित्र और विरोधी—सभी के प्रति उनका पोषणकारी स्वभाव समान बताया गया है। यह चित्र भक्त को करुणा, समभाव और निःस्वार्थ सेवा की प्रेरणा देता है।

गोमाता की आरती का आध्यात्मिक महत्व

हिंदू परंपरा में गोमाता के प्रति आदर का संबंध मातृत्व, पोषण और जीवों के प्रति करुणा से है। कृष्णभक्ति में यह भाव ब्रज के गोधन, गोचारण और गोसेवा की स्मृतियों से विशेष रूप से जुड़ता है। श्रद्धालु मानते हैं कि गोमाता की आरती मन में कृतज्ञता और सेवा की भावना को पुष्ट करती है। इस उपासना का व्यावहारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है: पशु के लिए स्वच्छ पानी, उपयुक्त चारा, साफ आश्रय और कोमल व्यवहार। आरती में व्यक्त आदर को ऐसे दैनिक आचरण से जोड़ना भक्ति को सहज और सार्थक बनाता है। परिवार के साथ आरती करते समय बच्चों को भी जीवों की आवश्यकताओं और उनके प्रति संवेदनशील व्यवहार का महत्व समझाया जा सकता है।

आरती कब और कैसे करें

आप प्रातः या सायंकाल पूजन के बाद गोमाता की आरती कर सकते हैं। गोवत्स द्वादशी, जिसे कुछ क्षेत्रों में वसु बारस कहते हैं, और गोपाष्टमी पर इसके विशेष आयोजन होते हैं। इस वर्ष की तिथि और मुहूर्त के लिए DivyaKaal का संबंधित पर्व पृष्ठ देखें। स्वच्छ थाली में स्थिर दीपक रखें और गोमाता के चित्र या प्रतिमा के सम्मुख दक्षिणावर्त घुमाएँ। एक प्रचलित क्रम में चरणों पर चार, नाभि पर दो, मुख पर एक और पूरे स्वरूप पर सात बार दीप घुमाया जाता है; कुल और संप्रदाय के अनुसार क्रम बदल सकता है। घंटी का स्वर सौम्य रखें। जीवित गाय के पास आरती करते समय परिचित सेवक की सहायता लें, लौ सुरक्षित दूरी पर रखें और तेज ध्वनि से बचें। उसकी सहजता और शांत वातावरण का ध्यान रखते हुए आरती संपन्न करें।

आरती के बाद प्रणाम, प्रसाद और सेवा

आरती पूरी होने पर हाथों को लौ से सुरक्षित ऊँचाई पर ले जाकर उसकी ऊष्मा ग्रहण करें और हाथ मस्तक से लगाएँ। यह आरती लेने की प्रचलित रीति है। इसके बाद श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें और अर्पित प्रसाद परिवार या उपस्थित भक्तों में बाँटें। दीपक को स्थिर, अग्निसुरक्षित स्थान पर रखें। यदि गोशाला में पूजन कर रहे हैं, तो गाय को दिया जाने वाला आहार वहाँ के सेवक की सलाह से चुनें और उसकी नियमित आहार-व्यवस्था का ध्यान रखें। सेवा में पानी के पात्र भरना, परिसर साफ रखना या गोशाला की आवश्यकताओं में सहयोग देना भी शामिल हो सकता है। इस तरह आरती का समापन शांत कृतज्ञता और उपयोगी सेवा के साथ होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गौ माता की आरती कब करनी चाहिए?

गौ माता की आरती प्रातः या सायंकाल पूजन के बाद की जा सकती है। गोवत्स द्वादशी और गोपाष्टमी पर इसका विशेष महत्व माना जाता है। नियमित गोसेवा करने वाले परिवार अपनी सुविधा और स्थानीय परंपरा के अनुसार समय चुनते हैं।

क्या गौ माता के चित्र के सामने आरती कर सकते हैं?

हाँ, घर में गौ माता के स्वच्छ चित्र या प्रतिमा के सामने श्रद्धापूर्वक आरती कर सकते हैं। पूजन का स्थान साफ रखें और दीपक स्थिर थाली में रखें। आरती के भावों के साथ करुणा और जीवसेवा का संकल्प जोड़ना सुंदर अभ्यास है।

गौ माता की आरती में दीपक कैसे घुमाएँ?

दीपक दक्षिणावर्त घुमाया जाता है। एक प्रचलित क्रम चरणों पर चार, नाभि पर दो, मुख पर एक और पूरे स्वरूप पर सात बार का है। अपनी पारिवारिक परंपरा का अनुसरण करें। जीवित गाय के समीप लौ पर्याप्त दूरी पर रखें।

गोपाष्टमी और गोवत्स द्वादशी की तिथि कहाँ देखें?

इस वर्ष की तिथि और मुहूर्त के लिए DivyaKaal का संबंधित पर्व पृष्ठ देखें। गोवत्स द्वादशी को कुछ क्षेत्रों में वसु बारस कहा जाता है। इन पर्वों पर गौपूजन, बछड़े के प्रति स्नेह और गोसेवा की परंपराएँ क्षेत्र के अनुसार भिन्न होती हैं।

गोमाता के प्रति श्रद्धा को करुणा, स्वच्छता और नियमित सेवा में व्यक्त करें।