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अहोई अष्टमी व्रत कथा
📖 व्रत कथा · अहोई माता

अहोई अष्टमी व्रत कथा

अहोई माता के पूजन में श्रद्धापूर्वक यह पारंपरिक कथा पढ़ें अथवा सुनें। साहूकार की छोटी बहू, सुरही गाय और स्याहू माता की यह कथा सेवा, करुणा और मातृ-आशीर्वाद की महिमा कहती है।

पाठ स्रोत: DivyaKaal
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अहोई अष्टमी व्रत कथा

एक नगर में एक साहूकार के सात पुत्र, सात बहुएँ और एक पुत्री थी। दीपावली पर पुत्री मायके आई। घर लीपने की मिट्टी लेने सातों बहुएँ वन गईं तो ननद भी साथ हो ली। मिट्टी खोदते समय उसकी खुरपी से स्याहू का एक बच्चा मर गया। दुखी स्याहू ने उसकी कोख बाँधने का शाप दिया।

भयभीत ननद ने भाभियों से विनती की कि कोई उसके बदले यह बंधन स्वीकार कर ले। छोटी भाभी मान गई। इसके बाद उसकी संतान जन्म लेने के सातवें दिन चल बसती। व्याकुल बहू ने पंडित से उपाय पूछा। उन्होंने सुरही गाय की सेवा बताई, जो स्याहू की सखी थी।

बहू प्रतिदिन तड़के उठकर गाय का स्थान साफ करती और सेवा करती। एक दिन सुरही ने उसे देख लिया। प्रसन्न होकर इच्छा पूछी तो बहू ने अपना दुख सुनाया और स्याहू से कोख खुलवाने की प्रार्थना की। सुरही उसे साथ लेकर चली।

रास्ते में दोनों वृक्ष की छाया में ठहरीं। वहाँ गरुड़ पंखिनी के बच्चे थे। बहू ने एक साँप को उनकी ओर बढ़ते देखा और उसे मारकर बच्चों को बचा लिया। पंखिनी लौटी तो रक्त देखकर बहू को दोषी समझ बैठी। बहू ने मरा साँप दिखाकर बात बताई। पंखिनी कृतज्ञ हुई और दोनों को अपनी पीठ पर बैठाकर सात समुद्र पार स्याहू के पास पहुँचा दिया।

स्याहू ने सुरही का स्वागत किया। उसके कहने पर बहू ने स्याहू के सिर की जुएँ निकालकर सेवा की। प्रसन्न स्याहू ने सात पुत्रों और सात बहुओं का आशीर्वाद दिया। बहू बोली कि उसकी तो कोख बँधी है; वह आशीर्वाद कैसे फलेगा? स्याहू से वचन लेकर उसने बताया कि बंधन उन्हीं के पास है।

अपने वचन का मान रखकर स्याहू ने बंधन खोल दिया और कहा कि घर जाकर अहोई माता का उद्यापन करे, सात अहोई बनाए और सात कड़ाही दे। बहू घर पहुँची तो सात पुत्र और सात बहुएँ देखकर आनंदित हुई। उसने श्रद्धापूर्वक उद्यापन किया।

जेठानियाँ सोच रही थीं कि छोटी बहू बच्चों को याद करके रोएगी, पर उसके घर से विलाप न सुनाई दिया। समाचार जानने भेजे बच्चों ने लौटकर उद्यापन का उत्सव बताया। सब वहाँ पहुँचीं तो बहू ने स्याहू माता की कृपा सुनाई। परिवार ने माता की जय बोली।

हे अहोई माता! जैसे आपने छोटी बहू का दुख दूर किया, वैसे सबके घर मंगल करें। कथा कहने-सुनने वालों और उनकी संतानों पर कृपा बनाए रखें। जय अहोई माता!

॥ कथा समाप्त ॥

कथा सुनने का क्रम

अहोई माता का पूजन करके परिवार सहित शांत मन से कथा सुनें। अंत में माता को प्रणाम करें, आरती करें और कुलाचार के अनुसार अर्घ्य देकर प्रसाद ग्रहण करें। विस्तृत पूजन क्रम और सामग्री सूची इसी पर्व से जुड़े पृष्ठों पर उपलब्ध हैं।

कथा का भाव

दूसरे के दुख को समझना, जीवों की रक्षा करना, निःस्वार्थ सेवा और आशीर्वाद का सम्मान—यही इस कथा की प्रेरणा है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

स्याहू किसे कहते हैं?

इस कथा में स्याहू साही अथवा सेह है, जिसके बच्चे को मिट्टी खोदते समय चोट लगती है।

सुरही गाय ने बहू की सहायता क्यों की?

बहू की निःस्वार्थ सेवा से प्रसन्न होकर सुरही उसे अपनी सखी स्याहू के पास ले गई।

यह कथा कब सुनें?

अहोई अष्टमी के पूजन में परिवार की परंपरा के अनुसार कथा पढ़ें अथवा सुनें।

अहोई माता सभी संतानों की रक्षा करें और हर परिवार में मंगल बनाए रखें। जय अहोई माता!