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अहोई अष्टमी व्रत पूजा विधि
🌺 पूजा विधि · अहोई माता

अहोई अष्टमी व्रत पूजा विधि

संतान की मंगलकामना हेतु संपूर्ण पूजन क्रम, संकल्प, कथा, तारा अर्घ्य और व्रत पारण। कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता का व्रत संतान की दीर्घायु, आरोग्य और सुख-समृद्धि की कामना से किया जाता है। इस दिन माताएँ श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर सायंकाल अहोई माता का पूजन करती हैं, व्रत-कथा सुनती हैं और तारों को अर्घ्य देकर अपनी कुल-परंपरा के अनुसार व्रत पूर्ण करती हैं। माता की आराधना में शुद्ध भाव, जीवमात्र के प्रति दया और परिवार के मंगल की प्रार्थना प्रधान है।

पाठ स्रोत: DivyaKaal
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पूजा विधि — क्रमवार

  1. १. प्रातः स्नान और व्रत का संकल्प

    प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान का स्मरण कर अहोई माता को प्रणाम करें। हाथ में थोड़ा जल और अक्षत लेकर अपने नाम तथा संतान का स्मरण करते हुए संकल्प करें—“हे अहोई माता! मैं अपनी संतान की दीर्घायु, आरोग्य, सद्बुद्धि और मंगल के लिए श्रद्धापूर्वक अहोई अष्टमी का व्रत एवं पूजन करूँगी। माता, मेरा पूजन स्वीकार करें और परिवार पर कृपा बनाए रखें।” संकल्प के बाद जल किसी स्वच्छ पात्र में छोड़ दें।

  2. २. पूजास्थल की तैयारी और अहोई की स्थापना

    घर में स्वच्छ स्थान पर चौक बनाकर चौकी बिछाएँ। चौकी पर स्वच्छ वस्त्र रखें और अहोई माता का चित्र स्थापित करें। जिन घरों में गेरू से दीवार पर अहोई माता, स्याहू और उसके बच्चों का चित्र बनाने की रीति है, वहाँ उसी परंपरा के अनुसार चित्र बनाएँ। पूजन की सामग्री क्रम से सजाकर रखें।

  3. ३. कलश और करवा रखना

    माता के सामने स्वच्छ जल से भरा कलश अथवा लोटा रखें। कुलाचार के अनुसार करवा रखें, उस पर मौली बाँधें और ढक्कन या कटोरी से ढक दें। अर्घ्य का पात्र अलग तैयार रखें। जिन परिवारों में चाँदी की अहोई अथवा स्याहू की माला पूजी जाती है, उसे भी पूजन में रखें।

  4. ४. श्रीगणेश स्मरण और दीप प्रज्वलन

    सायंकाल पूजन के समय आसन पर बैठें। पहले श्रीगणेश का स्मरण करके निर्विघ्न पूजन की प्रार्थना करें। घी का दीपक जलाएँ और धूप अर्पित करें। मन को शांत करके अहोई माता का ध्यान करें।

  5. ५. अहोई माता का पूजन

    अहोई माता को रोली, अक्षत, पुष्प तथा कुल-परंपरा के अनुसार चुनरी और शृंगार-सामग्री अर्पित करें। चाँदी की अहोई और माला का भी तिलक करके पूजन करें। माता से संतान के सुख, स्वास्थ्य, सदाचार और दीर्घायु की प्रार्थना करें।

  6. ६. भोग और नैवेद्य अर्पण

    माता को मीठे पुए अथवा हलवे, फल, बताशे और घर में बने पकवानों का भोग लगाएँ। अपने घर की रीति के अनुसार पूरी-सब्जी आदि नैवेद्य भी रखें। भोग के साथ स्वच्छ जल अर्पित करें और कुछ समय माता का ध्यान करें।

  7. ७. अहोई अष्टमी की कथा सुनना

    परिवार की महिलाओं और बच्चों सहित श्रद्धापूर्वक अहोई अष्टमी की व्रत-कथा पढ़ें अथवा सुनें। कथा के समय हाथ में अक्षत या अन्न रखने की रीति हो तो उसका पालन करें। कथा के अंत में अहोई माता की जय बोलें और जीवमात्र के प्रति करुणा तथा संतान के मंगल का भाव रखें।

  8. ८. आरती और मंगल-प्रार्थना

    माता की आरती करें। दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करें—“हे अहोई माता! हमारी संतानों की रक्षा करें, उन्हें आरोग्य, सद्बुद्धि और शुभ संस्कार दें। परिवार में प्रेम, सौहार्द और मंगल बनाए रखें।” पूजन में हुई भूल के लिए क्षमा माँगें और प्रणाम करें।

  9. ९. तारों को अर्घ्य देना

    सायंकाल तारे दिखाई देने पर कुलाचार के अनुसार जल अथवा दूध-मिश्रित जल से अर्घ्य दें। अहोई माता का स्मरण करते हुए संतान की मंगलकामना करें। जिन परिवारों में चंद्रदर्शन और चंद्र-अर्घ्य के बाद व्रत पूर्ण करने की रीति है, वे अपनी उसी परंपरा का पालन करें।

  10. १०. बड़ों का आशीर्वाद और व्रत पारण

    पूजन और अर्घ्य के बाद घर के बड़ों को प्रणाम करके आशीर्वाद लें। बायना देने की रीति हो तो पकवान, फल और दक्षिणा श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। माता का प्रसाद ग्रहण कर जल पिएँ और कुल-परंपरा के अनुसार भोजन से व्रत का पारण करें। प्रसाद परिवार में बाँटें।

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पूजा सामग्री सूची

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पूजन की मुख्य सामग्री7

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अहोई अष्टमी व्रत का महत्त्व

अहोई माता की उपासना में संतान के प्रति वात्सल्य और समस्त प्राणियों के प्रति करुणा का भाव समाहित है। व्रत-कथा पश्चात्ताप, सेवा और दया की प्रेरणा देती है। व्रती दिनभर संयम रखें, मधुर वचन बोलें और मन में माता का स्मरण करें।

व्रत और कुलाचार

अनेक परिवारों में निर्जल व्रत रखा जाता है और कहीं फलाहार की परंपरा है। अपने सामर्थ्य और कुलाचार के अनुसार व्रत धारण करें। पूजन में चित्र, चाँदी की अहोई, माला, भोग और बायने की रीति घर-घर में भिन्न होती है। परिवार में चली आ रही रीति को श्रद्धापूर्वक निभाएँ।

तारा-अर्घ्य और चंद्र-अर्घ्य की परंपरा

अहोई अष्टमी पर अनेक घरों में तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। कुछ कुलों में चंद्रदर्शन के पश्चात अर्घ्य और पारण होता है। अपने घर की परंपरा के अनुसार अर्घ्य का क्रम रखें।

पर्व की तिथि और पूजा सामग्री

तिथि एवं पूजा समय के लिए DivyaKaal का अहोई अष्टमी पर्व पृष्ठ देखें और वहाँ अपना स्थान चुनें। पूजन से पहले अहोई अष्टमी व्रत पूजा की सामग्री सूची के अनुसार सामग्री एकत्र कर लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अहोई अष्टमी की पूजा किसके लिए की जाती है?

अहोई माता का पूजन संतान की दीर्घायु, आरोग्य, सुख और मंगलकामना के लिए किया जाता है।

अहोई माता का पूजन कब करें?

अहोई अष्टमी के दिन सायंकाल माता का पूजन और कथा-श्रवण करें। तिथि और स्थानानुसार पूजा समय के लिए अहोई अष्टमी पर्व पृष्ठ देखें।

क्या दीवार पर अहोई का चित्र बनाना आवश्यक है?

जिन घरों में गेरू से चित्र बनाने की रीति है, वहाँ उसी प्रकार पूजन किया जाता है। अन्य परिवारों में अहोई माता का स्वच्छ चित्र अथवा कैलेंडर स्थापित करके पूजा की जाती है।

अहोई माता को क्या भोग लगाएँ?

मीठे पुए अथवा हलवा, फल, बताशे और कुल-परंपरा के अनुसार बने पकवान माता को अर्पित करें।

व्रत तारों को देखकर खोलें या चंद्रमा को देखकर?

अनेक परिवारों में तारा-अर्घ्य के बाद पारण होता है; कुछ परिवार चंद्रदर्शन के बाद व्रत खोलते हैं। अपने कुलाचार के अनुसार व्रत पूर्ण करें।

चाँदी की अहोई का क्या करें?

जिन घरों में चाँदी की अहोई अथवा स्याहू की माला की परंपरा है, वहाँ उसे पूजन में रखकर तिलक करें और कुलाचार के अनुसार धारण करें। पूजन के बाद उसे सम्मानपूर्वक सुरक्षित रखें।

अहोई माता हमारी संतानों को आरोग्य, सद्बुद्धि और दीर्घायु प्रदान करें। प्रत्येक घर में प्रेम, करुणा और मंगल का वास हो। जय अहोई माता!