पूजा विधि — क्रमवार
१. प्रातः स्नान और व्रत का संकल्प
प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान का स्मरण कर अहोई माता को प्रणाम करें। हाथ में थोड़ा जल और अक्षत लेकर अपने नाम तथा संतान का स्मरण करते हुए संकल्प करें—“हे अहोई माता! मैं अपनी संतान की दीर्घायु, आरोग्य, सद्बुद्धि और मंगल के लिए श्रद्धापूर्वक अहोई अष्टमी का व्रत एवं पूजन करूँगी। माता, मेरा पूजन स्वीकार करें और परिवार पर कृपा बनाए रखें।” संकल्प के बाद जल किसी स्वच्छ पात्र में छोड़ दें।
२. पूजास्थल की तैयारी और अहोई की स्थापना
घर में स्वच्छ स्थान पर चौक बनाकर चौकी बिछाएँ। चौकी पर स्वच्छ वस्त्र रखें और अहोई माता का चित्र स्थापित करें। जिन घरों में गेरू से दीवार पर अहोई माता, स्याहू और उसके बच्चों का चित्र बनाने की रीति है, वहाँ उसी परंपरा के अनुसार चित्र बनाएँ। पूजन की सामग्री क्रम से सजाकर रखें।
३. कलश और करवा रखना
माता के सामने स्वच्छ जल से भरा कलश अथवा लोटा रखें। कुलाचार के अनुसार करवा रखें, उस पर मौली बाँधें और ढक्कन या कटोरी से ढक दें। अर्घ्य का पात्र अलग तैयार रखें। जिन परिवारों में चाँदी की अहोई अथवा स्याहू की माला पूजी जाती है, उसे भी पूजन में रखें।
४. श्रीगणेश स्मरण और दीप प्रज्वलन
सायंकाल पूजन के समय आसन पर बैठें। पहले श्रीगणेश का स्मरण करके निर्विघ्न पूजन की प्रार्थना करें। घी का दीपक जलाएँ और धूप अर्पित करें। मन को शांत करके अहोई माता का ध्यान करें।
५. अहोई माता का पूजन
अहोई माता को रोली, अक्षत, पुष्प तथा कुल-परंपरा के अनुसार चुनरी और शृंगार-सामग्री अर्पित करें। चाँदी की अहोई और माला का भी तिलक करके पूजन करें। माता से संतान के सुख, स्वास्थ्य, सदाचार और दीर्घायु की प्रार्थना करें।
६. भोग और नैवेद्य अर्पण
माता को मीठे पुए अथवा हलवे, फल, बताशे और घर में बने पकवानों का भोग लगाएँ। अपने घर की रीति के अनुसार पूरी-सब्जी आदि नैवेद्य भी रखें। भोग के साथ स्वच्छ जल अर्पित करें और कुछ समय माता का ध्यान करें।
७. अहोई अष्टमी की कथा सुनना
परिवार की महिलाओं और बच्चों सहित श्रद्धापूर्वक अहोई अष्टमी की व्रत-कथा पढ़ें अथवा सुनें। कथा के समय हाथ में अक्षत या अन्न रखने की रीति हो तो उसका पालन करें। कथा के अंत में अहोई माता की जय बोलें और जीवमात्र के प्रति करुणा तथा संतान के मंगल का भाव रखें।
८. आरती और मंगल-प्रार्थना
माता की आरती करें। दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करें—“हे अहोई माता! हमारी संतानों की रक्षा करें, उन्हें आरोग्य, सद्बुद्धि और शुभ संस्कार दें। परिवार में प्रेम, सौहार्द और मंगल बनाए रखें।” पूजन में हुई भूल के लिए क्षमा माँगें और प्रणाम करें।
९. तारों को अर्घ्य देना
सायंकाल तारे दिखाई देने पर कुलाचार के अनुसार जल अथवा दूध-मिश्रित जल से अर्घ्य दें। अहोई माता का स्मरण करते हुए संतान की मंगलकामना करें। जिन परिवारों में चंद्रदर्शन और चंद्र-अर्घ्य के बाद व्रत पूर्ण करने की रीति है, वे अपनी उसी परंपरा का पालन करें।
१०. बड़ों का आशीर्वाद और व्रत पारण
पूजन और अर्घ्य के बाद घर के बड़ों को प्रणाम करके आशीर्वाद लें। बायना देने की रीति हो तो पकवान, फल और दक्षिणा श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। माता का प्रसाद ग्रहण कर जल पिएँ और कुल-परंपरा के अनुसार भोजन से व्रत का पारण करें। प्रसाद परिवार में बाँटें।




