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करवा चौथ व्रत कथा एवं विनायक जी की कथा
📖 व्रत कथा · करवा माता एवं श्रीगणेश

करवा चौथ व्रत कथा एवं विनायक जी की कथा

करवा चौथ व्रत कथा तथा विनायक स्वरूप गणेश जी की कथा का संपूर्ण पाठ।

पाठ स्रोत: DivyaKaal
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करवा चौथ व्रत कथा एवं विनायक जी की कथा

करवा चौथ व्रत कथा

एक साहूकार के एक पुत्री और सात पुत्र थे। करवा चौथ के दिन साहूकार की पत्नी, बेटी और बहुओं ने व्रत रखा। रात्रि को साहूकार के पुत्र भोजन करने लगे तो उन्होंने अपनी बहन से भोजन करने के लिए कहा। बहन बोली—“भाई! अभी चन्द्रमा नहीं निकला है, उसके निकलने पर मैं अर्घ्य देकर भोजन करूँगी।”

इस पर भाइयों ने नगर से बाहर जाकर अग्नि जला दी और छलनी ले जाकर उसमें से प्रकाश दिखाते हुए बहन से कहा—“बहन! चन्द्रमा निकल आया है। अर्घ्य देकर भोजन कर लो।”

बहन अपनी भाभियों को भी बुला लाई कि तुम भी चन्द्रमा को अर्घ्य दे लो, किन्तु वे अपने पतियों की करतूतें जानती थीं। उन्होंने कहा—“बाईजी! अभी चन्द्रमा नहीं निकला है। तुम्हारे भाई चालाकी करते हुए अग्नि का प्रकाश छलनी से दिखा रहे हैं।”

किन्तु बहन ने भाभियों की बात पर ध्यान नहीं दिया और भाइयों द्वारा दिखाए प्रकाश को ही अर्घ्य देकर भोजन कर लिया। इस प्रकार व्रत भंग होने से गणेश जी उससे रुष्ट हो गए। इसके बाद उसका पति सख्त बीमार हो गया और जो कुछ घर में था, उसकी बीमारी में लग गया। साहूकार की पुत्री को जब अपने दोष का पता लगा तो वह पश्चाताप से भर उठी। गणेश जी से क्षमा-प्रार्थना करने के बाद उसने पुनः विधि-विधान से चतुर्थी का व्रत करना आरम्भ कर दिया। श्रद्धानुसार सबका आदर-सत्कार करते हुए, सबसे आशीर्वाद लेने में ही उसने मन को लगा दिया।

इस प्रकार उसके श्रद्धाभक्ति सहित कर्म को देख गणेश जी उस पर प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसके पति को जीवनदान दे उसे बीमारी से मुक्त करने के पश्चात् धन-सम्पत्ति से युक्त कर दिया।

इस प्रकार जो कोई छल-कपट से रहित श्रद्धाभक्तिपूर्वक चतुर्थी का व्रत करेगा, वह सब प्रकार से सुखी होते हुए कष्ट-कंटकों से मुक्त हो जाएगा।

विनायक स्वरूप गणेश जी की कथा

किसी नगर में अपने पुत्र और पुत्रवधू के साथ एक नेत्रहीन बुढ़िया रहती थी। वह श्रद्धापूर्वक विधि-विधान से नित्य ही गणेश जी की पूजा-अर्चना करती थी। एक दिन प्रसन्न हो गणेश जी प्रकट हुए और बोले—“बुढ़िया माँ! तू जो चाहे सो मांग ले।”

बुढ़िया बोली—“कैसे और क्या मांगू? मुझे तो मांगना आता ही नहीं है।”

तब गणेश जी बोले—“अपने बहू-बेटे से पूछकर मांग लेना। मैं कल फिर आऊँगा।”

बुढ़िया ने बेटे से पूछा तो बेटा बोला कि ‘धन मांग लो।’ बहू बोली कि ‘पोता मांग लो।’ तब बुढ़िया ने सोचा कि ये दोनों तो अपने-अपने मतलब की बात कह रहे हैं।

अतः बुढ़िया ने पड़ोसिनों से पूछा। पड़ोसिनों ने कहा—“बुढ़िया, तू तो थोड़े ही दिन जिएगी। क्यों तू धन मांगे और क्यों पोता मांगे। तू तो आँखें मांग ले, जिससे तेरा बाकी जीवन आराम से कट जाए।”

लेकिन उस बुढ़िया ने पड़ोसिनों की बात नहीं मानी। उसने सोचा कि जिसमें बहू-बेटा राजी हों, वह मांग लूँ और अपने मतलब की चीज भी मांग लूँ। अगले दिन गणेश जी आए और बोले—“बुढ़िया माँ! जो चाहे सो मांग ले।”

बुढ़िया बोली—“यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे नौ करोड़ की माया दें। निरोगी काया दें, आँखों की रोशनी दें, पोता दें, सब परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष दें।”

गणेश जी बोले—“बुढ़िया माँ! तूने तो हमें ठग लिया। किन्तु तेरा वर तुझे मिलेगा—तथास्तु!” इतना कहकर गणेश जी अंतर्धान हो गए। बुढ़िया को वर के अनुसार सब कुछ मिल गया।

हे सिद्धि विनायक गणेश जी! जैसे तुमने उस बुढ़िया को सब कुछ दिया, वैसे ही हमें भी देने की कृपा करना। बोलो गणपति बाबा की जय!

॥ कथा समाप्त ॥

कथा-श्रवण का क्रम

करवा चौथ के पूजन में शांत मन से परिवार सहित बैठें। पहले साहूकार-कन्या की करवा चौथ व्रत कथा और फिर विनायक स्वरूप गणेश जी की कथा पढ़ें अथवा सुनें। दोनों कथाओं के अंत की प्रार्थना श्रद्धापूर्वक कहें और भगवान को प्रणाम करें।

दोनों कथाओं का संदेश

साहूकार-कन्या की कथा व्रत में सत्य, श्रद्धा, अपनी भूल स्वीकार करने और पुनः विधिपूर्वक आराधना करने की प्रेरणा देती है। विनायक जी की कथा में बुढ़िया अपने साथ पूरे परिवार का सुख और अंत में मोक्ष माँगती है। उसके वर में आरोग्य, दृष्टि, संतान और परिवार के कल्याण की भावना समाहित है।

कथा के बाद पूजन की पूर्णता

कथा के पश्चात अपने कुलाचार के अनुसार आरती और मंगल-प्रार्थना करें। चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें। पूजन के विस्तृत क्रम, आरती और सामग्री की तैयारी के लिए संबंधित करवा चौथ पृष्ठ देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस पृष्ठ पर कौन-कौन सी कथाएँ हैं?

इस पृष्ठ पर साहूकार-कन्या की करवा चौथ व्रत कथा और विनायक स्वरूप गणेश जी की कथा का पूरा पाठ दिया गया है।

साहूकार-कन्या ने व्रत में क्या भूल की थी?

उसने भाभियों की बात न मानकर भाइयों द्वारा छलनी से दिखाए अग्नि-प्रकाश को चन्द्रमा समझ लिया और अर्घ्य देकर भोजन कर लिया।

साहूकार-कन्या ने अपनी भूल का सुधार कैसे किया?

उसने गणेश जी से क्षमा माँगी, फिर विधि-विधान से चतुर्थी का व्रत आरम्भ किया और सबका आदर-सत्कार करते हुए आशीर्वाद लेने में मन लगाया।

विनायक जी की कथा में बुढ़िया ने क्या माँगा?

उसने नौ करोड़ की माया, निरोगी काया, आँखों की रोशनी, पोता, पूरे परिवार का सुख और अंत में मोक्ष माँगा।

क्या दोनों कथाएँ पूरी पढ़नी चाहिए?

इस पृष्ठ पर दोनों कथाएँ संपूर्ण दी गई हैं। कथा-श्रवण में उनके पूरे क्रम और अंत की प्रार्थना को श्रद्धापूर्वक पढ़ें अथवा सुनें।

करवा माता और सिद्धि विनायक गणेश जी सबके परिवार में आरोग्य, सौभाग्य, सद्बुद्धि और मंगल बनाए रखें। बोलो गणपति बाबा की जय!