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देवीकवचम् — श्री दुर्गा कवच
🕉️ स्तोत्र एवं स्तुति · माँ दुर्गा

देवीकवचम् — श्री दुर्गा कवच

देवीकवचम् माँ दुर्गा की सर्वांगीण रक्षा-प्रार्थना है। दुर्गा सप्तशती के पाठाङ्ग के रूप में पूजित इस कवच में मार्कण्डेय ऋषि के प्रश्न पर ब्रह्माजी देवी की महिमा सुनाते हैं। नवदुर्गा के पावन नामों से आरम्भ होकर यह प्रार्थना दसों दिशाओं, शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, परिवार और जीवन-पथ को जगदम्बा की शरण में अर्पित करती है। विनियोग और फलश्रुति सहित सम्पूर्ण पाठ श्रद्धापूर्वक पढ़ें।

पाठ स्रोत: दुर्गा सप्तशती — देव्याः कवचम् (मार्कण्डेय–ब्रह्मा संवाद)
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देवीकवचम् — श्री दुर्गा कवच

॥ अथ देव्याः कवचम् ॥

ॐ अस्य श्री चण्डीकवचस्य ॥ ब्रह्मा ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । चामुण्डा देवता । अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम् । दिग्बन्ध देवतास्तत्त्वम् । श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशती पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ॥

॥ ॐ नमश्चण्डिकायै ॥

मार्कण्डेय उवाच । ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् । यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १॥ ब्रह्मोवाच । अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् । देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ॥ २॥

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी । तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥ ३॥

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च । सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥ ४॥

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः । उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥ ५॥

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे । विषमे दुर्गमे चैव भयार्त्ताः शरणं गताः ॥ ६॥

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे । नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ॥ ७॥

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते । ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः ॥ ८॥

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना । ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ॥ ९॥

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना । लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया ॥ १०॥

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना । ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ॥ ११॥

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः । नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥ १२॥

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः । शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ॥ १३॥

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च । कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम् ॥ १४॥

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च । धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ॥ १५॥

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे । महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥ १६॥

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्द्धिनि । प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ॥ १७॥

दक्षिणेऽवतु वाराही नैरृत्यां खड्गधारिणी । प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद्वायव्यां मृगवाहिनी ॥ १८॥

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी । ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा ॥ १९॥

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना । जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ॥ २०॥

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता । शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता ॥ २१॥

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद्यशस्विनी । त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके ॥ २२॥

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी । कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शाङ्करी ॥ २३॥

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका । अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ॥ २४॥

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका । घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥ २५॥

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद्वाचं मे सर्वमङ्गला । ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ॥ २६॥

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी । स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद्बाहू मे वज्रधारिणी ॥ २७॥

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च । नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ॥ २८॥

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनःशोकविनाशिनी । हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ॥ २९॥

नाभौ च कामिनी रक्षेद्गुह्यं गुह्येश्वरी तथा । पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥ ३०॥

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी । जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥ ३१॥

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी । पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ॥ ३२॥

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी । रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा ॥ ३३॥

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती । अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी ॥ ३४॥

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा । ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु ॥ ३५॥

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा । अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी ॥ ३६॥

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् । वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ॥ ३७॥

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी । सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ॥ ३८॥

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी । यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ॥ ३९॥

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके । पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ॥ ४०॥

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा । राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ॥ ४१॥

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु । तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ॥ ४२॥

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः । कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति ॥ ४३॥

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः । यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् । परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ॥ ४४॥

निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः । त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ॥ ४५॥

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् । यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ॥ ४६॥

दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः । जीवेद्वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ॥ ४७॥

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः । स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ॥ ४८॥

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले । भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चौपदेशिकाः ॥ ४९॥

सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा । अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः ॥ ५०॥

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः । ब्रह्मराक्षसवेतालाः कुष्माण्डा भैरवादयः ॥ ५१॥

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते । मानोन्नतिर्भवेद्राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ॥ ५२॥

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले । जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ॥ ५३॥

यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् । तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी ॥ ५४॥

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् । प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामाया प्रसादतः ॥ ५५॥

लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ॥ ॐ ॥ ५६॥

॥ इति ॥

मूल पाठ: दुर्गा सप्तशती — देव्याः कवचम् (मार्कण्डेय–ब्रह्मा संवाद)

देवीकवचम् — श्री दुर्गा कवच — भावार्थ

मार्कण्डेय ऋषि ब्रह्माजी से मनुष्यों की सर्वप्रकार रक्षा करने वाला गूढ़ साधन पूछते हैं। ब्रह्माजी देवी के पुण्यमय कवच का उपदेश देते हुए पहले नवदुर्गा के नाम सुनाते हैं। इसके बाद चामुण्डा, वाराही, ऐन्द्री, वैष्णवी, माहेश्वरी और अन्य मातृशक्तियों के स्वरूप तथा आयुधों का वर्णन होता है। भक्त दसों दिशाओं में माता का संरक्षण माँगता है और सिर से चरणों तक प्रत्येक अंग, वाणी, मन, बुद्धि, प्राण तथा इन्द्रियों को उनके विभिन्न स्वरूपों की शरण में रखता है। आयु, धर्म, विद्या, धन, परिवार और मार्ग की रक्षा की प्रार्थना के बाद वह उन सभी स्थानों की भी रक्षा माँगता है जिनका उल्लेख छूट गया हो। फलश्रुति में श्रद्धापूर्वक कवच-पाठ की महिमा निर्भयता, मंगल, यश, कल्याण और अन्ततः महामाया की कृपा से परम पद की प्राप्ति के रूप में कही गई है।

दुर्गा सप्तशती में कवच का स्थान

विनियोग में “सप्तशती पाठाङ्गत्वेन” कहा गया है। चण्डी-पाठ की परम्परा में देवीकवच, अर्गलास्तोत्र और कीलकस्तोत्र का विशेष स्थान है। कवच की फलश्रुति में भी पहले कवच करके सप्तशती का जप करने का निर्देश आता है। विस्तृत अनुष्ठान में अपनी परम्परा के आचार्य का निर्धारित क्रम अपनाएँ।

नवदुर्गा और मातृशक्तियों का स्मरण

शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—इन नौ नामों के बाद मातृशक्तियों का वर्णन है। देवी के अनेक नाम और रूप एक ही जगदम्बा की विविध शक्तियों का स्मरण कराते हैं।

श्रद्धापूर्वक पाठ का क्रम

स्वच्छ स्थान पर आसन ग्रहण करें। श्रीगणेश और माँ दुर्गा का ध्यान करके दीपक तथा पुष्प अर्पित करें। विनियोग, नमश्चण्डिकायै, मार्कण्डेय–ब्रह्मा संवाद, रक्षा-प्रार्थना और पूरी फलश्रुति दिए हुए क्रम में पढ़ें। अंत में माता को प्रणाम करके सबके मंगल की प्रार्थना करें।

रक्षा-प्रार्थना का भाव

प्रत्येक अंग और दिशा का नाम आते समय अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को माँ की शरण में रखने का भाव करें। वाणी में मंगल, मन में शांति, बुद्धि में विवेक और आचरण में धर्म की प्रार्थना करें। “रक्षाहीनं तु यत्स्थानम्” में भक्त अपने से छूटे हुए प्रत्येक स्थान की रक्षा भी माता को सौंप देता है।

उच्चारण और नियमितता

संयुक्ताक्षर, दीर्घ स्वर, अनुस्वार तथा विसर्ग को ध्यान से पढ़ें। आरम्भ में गति धीमी रखें और अपनी स्वीकृत पुस्तक के पाठ का अनुसरण करें। नवरात्रि के साथ नित्य देवी-उपासना में भी अपनी परम्परा के अनुसार कवच-पाठ रखें। फलश्रुति में श्रद्धायुक्त त्रिसन्ध्या-पाठ की महिमा कही गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

देवीकवचम् और श्री दुर्गा कवच क्या एक ही पाठ हैं?

दुर्गा सप्तशती के साथ पढ़ा जाने वाला यह देवीकवच सामान्यतः श्री दुर्गा कवच या चण्डीकवच भी कहलाता है। इसी नाम से अन्य कवच भी मिलते हैं; यहाँ मार्कण्डेय–ब्रह्मा संवाद वाला पाठ है।

देवीकवच का ग्रंथ-आधार क्या रखा गया है?

यह दुर्गा सप्तशती की पाठ-परम्परा का देव्याः कवचम् है। इसके विनियोग में इसे सप्तशती का पाठाङ्ग कहा गया है।

क्या इसमें पूरी फलश्रुति दी गई है?

हाँ। विनियोग से आरम्भ करके रक्षा-प्रार्थना और “शिवेन सह मोदते” तक पूरी फलश्रुति दी गई है।

अलग पुस्तकों में श्लोक-संख्या अलग क्यों मिलती है?

कुछ संस्करण संयुक्त पंक्तियों को अलग श्लोकों में गिनते हैं और कुछ में पाठभेद भी होते हैं। केवल अंतिम संख्या के आधार पर पूर्णता न देखें; आरम्भ, क्रम और समापन का मिलान करें।

क्या इसका पाठ केवल नवरात्रि में करें?

नवरात्रि में इसका विशेष महत्त्व है। नित्य देवी-पूजन और चण्डी-पाठ में भी अपनी परम्परा के अनुसार पढ़ सकते हैं।

कवच में शरीर और दिशाओं के नाम क्यों आते हैं?

यह सर्वांगीण शरणागति का भाव है। भक्त प्रत्येक अंग, प्राण, मन, बुद्धि और दिशा में देवी के विभिन्न स्वरूपों का संरक्षण माँगता है।

हे जगदम्बे! हमारी वाणी, मन, बुद्धि और कर्मों की रक्षा कीजिए। जीवन के प्रत्येक मार्ग पर धर्म, साहस और सद्बुद्धि प्रदान कीजिए। आपकी करुणा से समस्त जगत का मंगल हो। जय माँ दुर्गा!